नंदा देवी बड़ी जात 2026 आज से शुरू: मां नंदा की कैलाश यात्रा में उमड़ा आस्था का सैलाब
नंदा देवी बड़ी जात 2026 को लेकर पिछले कई दिनों से चमोली के गांवों में तैयारियां चल रही थीं। अब 5 सितंबर को यात्रा शुरू होने के साथ ही यात्रा मार्ग के गांवों में उत्सव जैसा माहौल है। इस वर्ष लोकजात यात्रा का कार्यक्रम 5 सितंबर से 25 सितंबर 2026 तक निर्धारित किया गया है। 18 सितंबर को वेदनी में विशेष पूजा-अर्चना के बाद 25 सितंबर को मां नंदा राजराजेश्वरी की डोली देवराड़ा सिद्धपीठ में विराजमान होगी।
यह सिर्फ यात्रा नहीं, बेटी की विदाई है
नंदा देवी की इस यात्रा को समझने के लिए पहाड़ की उस भावना को समझना जरूरी है, जहां देवी और इंसान के बीच रिश्ता केवल पूजा का नहीं होता।
गढ़वाल की लोक परंपरा में मां नंदा को घर की बेटी माना जाता है। जब उनकी डोली मायके से निकलती है तो गांवों की महिलाएं भावुक हो उठती हैं। लोकगीतों में बेटी की विदाई का दर्द सुनाई देता है और पुरुष ढोल-दमाऊं की थाप के साथ यात्रा को आगे बढ़ाते हैं।
यही कारण है कि नंदा देवी की जात को देखने वाला व्यक्ति केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं देखता, बल्कि उसे पहाड़ के परिवार, रिश्ते और सदियों पुरानी संस्कृति का दर्शन होता है।
कुरुड़ से शुरू हुई आज की ऐतिहासिक यात्रा
5 सितंबर 2026 की सुबह सिद्धपीठ कुरुड़ में विशेष धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-अर्चना के बाद मां नंदा की डोली को विदाई दी गई। यात्रा शुरू होते ही श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बन रहा था। ताजा रिपोर्ट के अनुसार बड़ी संख्या में लोग मां नंदा के दर्शन और डोली की विदाई के लिए पहुंचे।
कुरुड़ से निकलने वाली यह यात्रा चमोली के बधाण क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यात्रा के दौरान जगह-जगह ग्रामीण मां नंदा का स्वागत करते हैं। घरों के दरवाजे और आंगन सजाए जाते हैं। महिलाएं मंगल गीत गाती हैं और श्रद्धालु मां से परिवार तथा गांव की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।
25 सितंबर तक चलेगी नंदा देवी लोकजात 2026
इस साल की नंदा देवी लोकजात यात्रा का दिनपट्टा पहले ही जारी किया जा चुका है। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार यात्रा 5 सितंबर से 25 सितंबर 2026 तक चलेगी। यात्रा के दौरान मां नंदा की डोली विभिन्न पड़ावों से होकर आगे बढ़ेगी और 18 सितंबर को वेदनी में विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी। इसके बाद 25 सितंबर को डोली देवराड़ा सिद्धपीठ में विराजमान होगी।
यात्रा का सबसे भावुक पक्ष वह परंपरा है, जब वेदनी के उच्च हिमालयी क्षेत्र में मां नंदा को कैलाश की ओर विदाई देने की धार्मिक मान्यता निभाई जाती है।
क्या 2026 में नंदा देवी राजजात नहीं हो रही?
यह सवाल इस समय सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है और यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।
2026 में आयोजित हो रही यात्रा को नंदा देवी लोकजात/बड़ी जात के रूप में समझना चाहिए। वहीं 12 वर्ष के चक्र में होने वाली मुख्य श्रीनंदा देवी राजजात को 2027 के लिए तय किया गया है।
जनवरी 2026 में राजजात समिति ने 2026 में प्रस्तावित मुख्य राजजात को स्थगित कर 2027 में आयोजित करने का निर्णय लिया था। बाद में बसंत पंचमी पर नौटी में राजकुंवर द्वारा 2027 में राजजात आयोजित किए जाने की घोषणा की गई।
यानी 2026 में नंदा की आस्था थमी नहीं है—आज बड़ी जात शुरू हो चुकी है, जबकि विशाल 12-वर्षीय राजजात की तैयारी 2027 के लिए आगे बढ़ रही है।
2027 की राजजात के लिए अभी से आने लगे आवेदन
नंदा देवी राजजात की अगली बड़ी यात्रा को लेकर तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं। सितंबर की शुरुआत में सामने आई जानकारी के अनुसार गढ़वाल और कुमाऊं की विभिन्न देव डोलियों और छंतोलियों की समितियां 2027 की राजजात में शामिल होने के लिए आवेदन देने लगी हैं।
इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आने वाली राजजात केवल एक स्थानीय यात्रा नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड की साझा धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का बड़ा आयोजन बनने जा रही है।
चौसिंगा खाडू से जुड़ी रहस्यमयी परंपरा
नंदा देवी राजजात की चर्चा चौसिंगा खाडू के बिना अधूरी है। चार सींग वाला विशेष मेढ़ा इस हिमालयी परंपरा की सबसे अलग पहचान माना जाता है।
राजजात के दौरान चौसिंगा खाडू से जुड़ी परंपराएं श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहती हैं। इसके साथ जुड़ी लोक मान्यताएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती आई हैं।
लेकिन नंदा देवी की यात्रा की खूबसूरती केवल धार्मिक प्रतीकों में नहीं है। असली कहानी उन हजारों लोगों की है जो कठिन पहाड़ी रास्तों पर पैदल चलते हुए अपनी देवी के साथ आगे बढ़ते हैं।
जब पूरा पहाड़ बन जाता है मां नंदा का घर
कल्पना कीजिए—पहाड़ों के बीच सुबह का समय है। दूर किसी गांव से ढोल की आवाज सुनाई देती है। रास्ते के किनारे महिलाएं खड़ी हैं। किसी के हाथ में पूजा की थाली है, किसी के हाथ में फूल।
फिर दिखाई देती है मां नंदा की डोली।
जयकारे गूंजते हैं—
“जय मां नंदा!”
कुछ क्षण के लिए लगता है जैसे रास्ता नहीं, पूरा हिमालय मां नंदा के स्वागत में खड़ा है।
यही वह दृश्य है जो नंदा देवी की यात्रा को बाकी धार्मिक यात्राओं से अलग करता है।
वेदनी बुग्याल तक पहुंचेगी आस्था की यह यात्रा
नंदा देवी की यात्रा का हिमालयी चरण सबसे ज्यादा रोमांच और आध्यात्मिक अनुभूति से भरा होता है। जैसे-जैसे यात्रा ऊंचाई की ओर बढ़ती है, प्रकृति अपना अलग रूप दिखाती है।
हरे-भरे बुग्याल, बादलों की आवाजाही, ठंडी हवाएं और दूर दिखाई देती हिमालय की चोटियां यात्रा को अविस्मरणीय बना देती हैं।
वेदनी क्षेत्र में होने वाली पूजा इस यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है। 2026 के कार्यक्रम में 18 सितंबर को वेदनी में विशेष पूजा-अर्चना निर्धारित है।
पर्यावरण बचाना भी श्रद्धालुओं की जिम्मेदारी
नंदा देवी की यात्रा जिस हिमालयी प्रकृति से होकर गुजरती है, वही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है। इसलिए श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए जरूरी है कि यात्रा के दौरान प्लास्टिक और कचरा न फैलाएं।
हिमालय केवल यात्रा का रास्ता नहीं है—यही मां नंदा की धरती है।
यदि इस यात्रा से जुड़ी धार्मिक आस्था आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचानी है तो हिमालयी पर्यावरण की रक्षा करना भी हमारी जिम्मेदारी है।
5 सितंबर 2026 से शुरू हुई इस यात्रा का महत्व
आज, 5 सितंबर 2026, जब कुरुड़ से मां नंदा की डोली आगे बढ़ी है, तब यह केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है।
यह उत्तराखंड की उस संस्कृति का दिन है जो आधुनिक समय के बावजूद अपनी जड़ों को नहीं भूली।
यह उस मां की यात्रा है जिसे पहाड़ अपनी बेटी मानता है।
यह उन गांवों की कहानी है जहां आज भी देवता केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि लोगों के जीवन का हिस्सा हैं।
और यह उस हिमालय की कहानी है, जहां धर्म और प्रकृति एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।
निष्कर्ष: 2026 में नंदा की डोली चली, 2027 में होगा हिमालयी महाकुंभ
नंदा देवी बड़ी जात 2026 आज 5 सितंबर से कुरुड़ से शुरू हो चुकी है और 25 सितंबर तक चलेगी। इस दौरान मां नंदा की डोली के साथ हजारों श्रद्धालु अपनी आस्था और परंपरा को आगे बढ़ाएंगे।
वहीं, 12 वर्ष के चक्र में होने वाली मुख्य श्रीनंदा देवी राजजात 2027 के लिए तैयारियां शुरू हो चुकी हैं और विभिन्न क्षेत्रों की देव डोलियों की सहभागिता को लेकर आवेदन आने लगे हैं।
शायद नंदा देवी की पूरी कहानी एक ही वाक्य में कही जा सकती है—
“पहाड़ अपनी बेटी को विदा करता है, लेकिन उसकी याद को अपने हर गांव, हर गीत और हर बुग्याल में हमेशा के लिए रख लेता है।”
और आज से शुरू हुई यह यात्रा उसी अमर परंपरा की एक नई कड़ी है।
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