केम्प्टी रेंज में वन कर्मियों की कार्यशाला का समापन; पर्यावरणविद् कल्याण सिंह रावत की उपस्थिति में वितरित हुए सर्टिफिकेट

कैम्पटी (उत्तराखंड): वनों के संरक्षण, जल संचयन और ग्रामीणों की आजीविका को सशक्त बनाने के उद्देश्य से आयोजित तीन दिवसीय तकनीकी कार्यशाला का सफलतापूर्वक समापन हो गया। इस समापन अवसर पर पर्यावरण जगत की जानी-मानी हस्ती श्री कल्याण सिंह रावत ने भाग लिया ।

​1. पद्मश्री कल्याण सिंह रावत 'मैती' का प्रेरक संबोधन

​कार्यशाला के अंतिम दिन मुख्य अतिथि के रूप में पद्मश्री कल्याण सिंह रावत 'मैती' उपस्थित रहे। उन्होंने वन पंचायतों से आए ग्रामीणों के साथ एक विशेष वार्ता सत्र आयोजित किया।

  • प्रमुख संदेश: उन्होंने कहा कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि पहाड़ों का जीवन आधार हैं।
  • मार्गदर्शन: उन्होंने ग्रामीणों को वनों की आग से सुरक्षा, जल स्रोतों (नौलों-धारों) के पुनर्जीवित करने और पारिस्थितिकी तंत्र को समझने पर जोर दिया।
​कार्यशाला का समापन विभागाध्यक्ष डॉ. जे. एस. एस. तोमर द्वारा किया गया। उनके द्वारा वनक्षेत्राधिकारी कैम्पटी, वनक्षेत्राधिकारी भद्रीगाड़ एवम कैम्पटी व भद्रिगाड के समस्त वन कर्मियों, वन पंचायत सरपंचों को सर्टिफिकेट वितरण भी किया गया ।

​2. तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा सर्टिफिकेट वितरण

​कार्यशाला के समापन पर मुख्य आकर्षण प्रमाण पत्र वितरण समारोह रहा। वन विभाग के समर्पित कर्मचारियों और विभिन्न क्षेत्रों से आए वन सरपंचों को उनकी सक्रिय भागीदारी के लिए सम्मानित किया गया।

  • उद्देश्य:
  • ● मृदा प्रबंधन और जल संरक्षण के वैज्ञानिक तरीकों को जमीनी स्तर पर लागू करना।
  • ● ​ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित आजीविका (जैसे मशरूम उत्पादन) को बढ़ावा देना।
  • ● ​जलवायु परिवर्तन (Climate Change) जैसी वैश्विक चुनौतियों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर तैयारी करना।


चर्चा के मुख्य बिंदु:

  1. कृषिवानिकी (Agroforestry): खेती के साथ-साथ पेड़ों को उगाने की तकनीक, जिससे आर्थिक लाभ के साथ पर्यावरण संतुलन भी बना रहे।
  2. आवारा पशु प्रबंधन: आवारा पशुओं की समस्या से फसलों और वनों को बचाने के वैज्ञानिक उपाय।
  3. सामुदायिक जल संसाधन: गांवों के प्राकृतिक जल स्रोतों (नौलों और धारों) को पुनर्जीवित करने की योजना।
  • मशरूम उत्पादन: उन्होंने इसे 'कम लागत-अधिक मुनाफा' वाला मॉडल बताया। पहाड़ी जलवायु मशरूम उत्पादन के लिए सर्वोत्तम है, जिससे ग्रामीण महिलाएं और युवा आत्मनिर्भर बन सकते हैं।
  • ऑर्गेनिक फार्मिंग (जैविक खेती): रासायनिक खाद के दुष्प्रभावों को समझाते हुए उन्होंने जैविक खाद और कीटनाशकों के निर्माण की विधि बताई। इससे मृदा की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है।

प्रमाण पत्र वितरण और सम्मान

​कार्यशाला के सफल समापन पर वन विभाग के कर्मचारियों और वन सरपंचों को सर्टिफिकेट वितरित किए गए। यह प्रमाण पत्र उनके द्वारा सीखे गए तकनीकी कौशल (जैसे ग्राफ्टिंग, मृदा परीक्षण और मशरूम उत्पादन) का प्रतीक हैं।




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