उत्तराखंड में प्रमुख प्राचीन मापतौल प्रणाली लंबाई (भूमि आदि) मापन प्रणाली |

🏔️ उत्तराखंड में प्रमुख प्राचीन मापतौल प्रणाली
लंबाई (भूमि आदि) मापन प्रणाली

 * राज्य में भूमि मापन की दो मुख्य इकाई है - मुट्ठी व नाली
 * 16 मुट्ठी (बीज की मात्रा) = एक नाली
 * 1 नाली = 200 वर्ग मी०
 * 2.5 नाली = 1 बीघा या 40 मुट्ठी
 * एक हेक्टेयर = 50 नाली या 10,000 वर्ग मी
 * 1 गज = 0.91 वर्ग मी
 * 45 गज = एक विश्वा
ठोस (धातु आदि) मापन प्रणाली
 * रुपये की छोटी इकाई कुड़ी होती थी
 * 12 टका = 1 सवासेर
 * 10 कुड़ी = एक दमड़ी
 * 3 पाई = 1 पैसा
 * 4 पैसा = 1 आना
 * 16 आना = एक रूपया
 * 8 रत्ती = एक माशा
 * 12 माशा = एक तोला या 10 ग्राम
 * 5 तोला = एक पल
 * 100 तोला या 20 पल = एक टका
ठोस व अन्य मापन प्रणाली
 * 1 मुट्ठी = 62.5 ग्राम होता है
 * 8 मुट्ठी = एक सेर
 * 1 सेर = 500 ग्राम
 * 2 सेर = एक कुड़ी या 1 किग्रा
 * 2 किग्रा = एक पाथा
 * 8 पाथा = 1 डाल या 16 किग्रा
 * 1 मण = 20 पाथा या 40 किग्रा
 * 2 कुड़ी = 1 पाथा = 2 किग्रा
 * 2 डाल = 1 द्रोण = 32 किग्रा
 * 20 कूड़ी = 1 विशत = 20 किग्रा
 * 20 पाथे = 1 मण = 40 किग्रा
 * 20 द्रोण = 1 खार = 640 किग्रा
 * 1 तामी = 250 ग्राम
 * 2 तामी = 1 सेर (1/2 किग्रा.)

👑 चंदकालीन प्रशासनिक व्यवस्था

 * महमूद गजनवी के आक्रमण के समय सोमचंद कुमाऊँ आया था
 * चंदों के राज्य में भूमि मापन की दो मुख्य इकाई है - मुट्ठी व नाली
 * चंदों के राजाओं के उपाधि श्रीराजाधिराज, महाराजाधिराज थी
 * चंदों के बारे में जानकारी ताम्रपत्रों के उत्कीर्णों को सुधार या सुपाठ्य करने के बाद मिलती है
 * ताम्र पत्रों के लेखक जोशी होते थे जिन्हें जोइसी कहा गया
 * ज्ञानचंद के गोबासा ताम्रपत्र में उत्कीर्ण के लिए लिखित इंद्र पदपादेरण नाम का प्रयोग हुआ है
 * चंदों के ताम्रपत्रों में राजाओं की वंशावली नहीं मिलती है, बल्कि कट्यूरियों के ताम्रपत्रों में राजाओं की वंशावली मिलती है
 * केवल एक मात्र चंद राजा जगत्चंद के बर्म ताम्रपत्र में उसके पिता का नाम मिलता है
 * चंदों की प्रारंभिक राजधानी चम्पावत, जो काली और चम्पावती नदी के तट पर थी
 * चंदों की दूसरी राजधानी अल्मोड़ा या आलम नगर में कोसी नदी के तट पर बनी
 * चंद शासन में राजधानी के लिए बुंगा, राजापुर, राजबाई शब्द का प्रयोग मिलता है
 * चंदकाल में गोला बारूद रखने वाले स्थान को सेलखाना कहा जाता था
 * चंदकाल में गाय-बैल रखने वाले स्थान को ठाठ जबकि मांस के लिए प्रयोग होने वाले जानवरों जैसे- बकरी, भेड़ आदि के रखने वाले स्थान को सीकर कहते थे तथा सीकर के अधिकारी को सीकरा या सांका कहा जाता था

🕌 चंदकालीन धार्मिक जीवन एवं स्थापत्य

 * बैजनाथ के मंदिरों में से लक्ष्मीनारायण का मंदिर चंदों ने बनवाया
 * चंद शासकों के राज चिह्न गाय था, ज्ञानचंद के समय गरुड़ राज चिह्न था
 * बागेश्वर का मंदिर मूलतः कट्यूरियों ने बनवाया था जबकि बागेश्वर के बागनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार लक्ष्मीचंद ने 1602 ई० में किया
 * पिथौरागढ़ में नकुलेश्वर मंदिर चंद कालीन है जिसके पास भगवान बुद्ध की भूमिस्पर्श मुद्रा में उत्कीर्ण मूर्ति है
 * मढ़ के सूर्य मंदिर चंद कालीन है जिसमें सात घोड़ों में विराजमान सूर्य देवता की प्रतिमा है और पास में एक हथिया देवाल है
 * पिथौरागढ़ के मर्सोली एवं कासनी में चंदकालीन पंचायतन शैली के पाँच-पाँच मंदिर थे जो वर्तमान में कुछ ही अस्तित्व में हैं
 * लालमंडी किला अल्मोड़ा पलटन बाजार में 1563 ई० में कल्याण चंद द्वारा निर्मित इसे फोर्ट मोयरा भी कहते हैं

🤝 चंदों की सामाजिक व्यवस्था

 * चंद राजा अपने आपको चंदवंशीय राजपूत मानते थे
 * गोली शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग तमिल साहित्य में मिलता है
 * जोला नामक ब्राह्मण व रावत नामक राजपूत कट्यूरी राजाओं के समय आए जबकि कोश्यारी राजपूत का मूलनिवास बंगाल था
 * जोशी व पंत नामक ब्राह्मण कुमाऊँ में महाराष्ट्र से आए थे
 * बरसड़े राजपूत राजस्थान के बाँसवाड़े से कुमाऊँ आए
 * कुमाऊँ के सबसे प्राचीनतम देवता ऐड़ी व छुरकुड़िया है, दोनों देवताओं को पशुचारकों द्वारा पूजा जाता है
 * कुमाऊँ में ब्राह्मणों के तीन वर्ग थे- चौथानी, पंचबिड़िया, खास ब्राह्मण। इन्हें स्थानीय भाषा में पितोलिया ब्राह्मण कहते हैं जिनमें चौथानी ब्राह्मण श्रेष्ठतम थे
 * राजस्थानी ब्राह्मणों के लिए ताम्रपत्र में ठकुर लिखता है राजपूत भी दो प्रकार के थे आर्य-राजपूत व ख़स राजपूत
 * आर्य राजपूत बाहरी भागों से यहां आये थे जिसके अन्तर्गत चंद राजा के वंशज भी आते हैं
 * वैश्य-वर्ग के लिए साह कहते थे जबकि जोलारी महल की चौकीदारी करते थे
 * कुमाऊँ में उत्कीर्णकों को काटगिया व टम्टा कहते थे जबकि कपड़े बुनने का कार्य राजकोली करते थे
 * कुमाऊँ के स्वर्णकारों द्वारा तिब्बत क्षेत्र से बोरैक्स का आयात किया जाता था














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