कैम्पटी रेंज में वन कर्मियों के लिए तीन दिवसीय कौशल विकास कार्यशाला का भव्य शुभारंभ: आधुनिक तकनीक से जुड़ेगा वन विभाग
कैम्पटी (मसूरी), 18 मार्च 2026
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण और वनों के प्रबंधन को एक नई दिशा देने के उद्देश्य से आज कैम्पटी रेंज में एक ऐतिहासिक पहल की गई। वन विभाग के कर्मचारियों और वन पंचायत प्रतिनिधियों को आधुनिक तकनीकों से लैस करने के लिए तीन दिवसीय कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यशाला का सफलतापूर्वक शुभारंभ हुआ।
यह कार्यशाला न केवल तकनीकी ज्ञान का आदान-प्रदान है, बल्कि यह मसूरी वन प्रभाग और स्थानीय समुदायों के बीच समन्वय स्थापित करने का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरी है।
1. कार्यशाला का आयोजन और मुख्य उद्देश्य
इस महत्वपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (IISWC), देहरादून द्वारा किया गया है। कार्यशाला का मुख्य प्रायोजक मसूरी वन प्रभाग है।
मुख्य उद्देश्य:
- वन कर्मियों को आधुनिक पर्यावरण तकनीकों से परिचित कराना।
- मृदा प्रबंधन और जल संरक्षण के वैज्ञानिक तरीकों को जमीनी स्तर पर लागू करना।
- ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित आजीविका (जैसे मशरूम उत्पादन) को बढ़ावा देना।
- जलवायु परिवर्तन (Climate Change) जैसी वैश्विक चुनौतियों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर तैयारी करना।
2. सहभागिता: भद्रीगाड़ और कैम्पटी रेंज का संगम
इस कार्यशाला में कुल 51 प्रशिक्षुओं ने पंजीकरण कराया, जिनमें वन विभाग के अनुभवी अधिकारियों से लेकर जमीनी स्तर पर काम करने वाले वन पंचायत सदस्य शामिल थे।
प्रमुख प्रतिभागी:
- भद्रीगाड़ रेंज: श्री अर्जुन सिंह (भट्टू गांव), श्री सुनील सिंह, श्री वीरेश और श्री अर्जुन सिंह (नैन गांव)।
- कैम्पटी रेंज: श्री सुंदर सिंह बर्थवाल (भटौली), श्री मोहन सिंह राणा, श्री रंजीत सिंह पंवार, श्री सूरज सिंह रावत और श्री राजेंद्र सिंह पंवार।
नेतृत्व और मार्गदर्शन:
कार्यक्रम का सफल संचालन कैम्पटी रेंज की वनक्षेत्राधिकारी श्रीमती अमिता थपलियाल और भद्रीगाड़ रेंज के वनक्षेत्राधिकारी श्री जी. एस. चौहान की देखरेख में किया गया। उनके मार्गदर्शन ने प्रतिभागियों में नई ऊर्जा का संचार किया।
3. विशेषज्ञों का संबोधन: जलवायु परिवर्तन और कृषिवानिकी
कार्यशाला का उद्घाटन विभागाध्यक्ष डॉ. जे. एस. एस. तोमर द्वारा किया गया। उन्होंने अपने संबोधन में कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदुओं को हाइलाइट किया:
"जलवायु परिवर्तन आज के दौर की सबसे बड़ी चुनौती है। वृक्षारोपण और जल संरक्षण अब केवल विकल्प नहीं, बल्कि हमारी अनिवार्यता बन चुके हैं।" — डॉ. जे. एस. एस. तोमर
चर्चा के मुख्य बिंदु:
- कृषिवानिकी (Agroforestry): खेती के साथ-साथ पेड़ों को उगाने की तकनीक, जिससे आर्थिक लाभ के साथ पर्यावरण संतुलन भी बना रहे।
- आवारा पशु प्रबंधन: आवारा पशुओं की समस्या से फसलों और वनों को बचाने के वैज्ञानिक उपाय।
- सामुदायिक जल संसाधन: गांवों के प्राकृतिक जल स्रोतों (नौलों और धारों) को पुनर्जीवित करने की योजना।
4. तकनीकी सत्र: मृदा और जल संरक्षण का विज्ञान
वैज्ञानिक इंजीनियर डॉ. एस. एस. श्रीमाली ने कार्यशाला के दौरान एक गहन तकनीकी सत्र लिया। उन्होंने बताया कि कैसे छोटी-छोटी संरचनाओं के माध्यम से पहाड़ की मिट्टी और पानी को बहने से रोका जा सकता है।
- मृदा परीक्षण (Soil Testing): उन्होंने जोर दिया कि किसी भी वृक्षारोपण से पहले मिट्टी की जांच अनिवार्य है ताकि सही प्रजाति के पौधों का चयन हो सके।
- जल संचय: चेक डैम और खंती (Trenches) निर्माण की आधुनिक विधियां सिखाई गईं।
- उत्पादकता: सही मृदा प्रबंधन से न केवल वन बढ़ते हैं, बल्कि आस-पास के खेतों की उत्पादकता में भी सुधार होता है।
5. आजीविका के नए आयाम: मशरूम और ऑर्गेनिक खेती
कार्यशाला का एक मुख्य आकर्षण डॉ. अनुपम बड़ का सत्र रहा, जिन्होंने वन आश्रित समुदायों के लिए आय के वैकल्पिक स्रोतों पर चर्चा की।
- मशरूम उत्पादन: उन्होंने इसे 'कम लागत-अधिक मुनाफा' वाला मॉडल बताया। पहाड़ी जलवायु मशरूम उत्पादन के लिए सर्वोत्तम है, जिससे ग्रामीण महिलाएं और युवा आत्मनिर्भर बन सकते हैं।
- ऑर्गेनिक फार्मिंग (जैविक खेती): रासायनिक खाद के दुष्प्रभावों को समझाते हुए उन्होंने जैविक खाद और कीटनाशकों के निर्माण की विधि बताई। इससे मृदा की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है।
6. बागवानी और ग्राफ्टिंग (कलम) का व्यावहारिक ज्ञान
तकनीकी अधिकारी मुदित मिश्रा ने प्रतिभागियों को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि व्यावहारिक (Field) प्रशिक्षण भी प्रदान किया।
- उन्नत किस्में: फलदार पौधों की ऐसी किस्मों के बारे में बताया गया जो कम पानी में और पहाड़ी ढलानों पर बेहतर फल देती हैं।
- कलम (Grafting) तकनीक: प्रशिक्षुओं को खुद अपने हाथों से कलम लगाना सिखाया गया। यह तकनीक पुराने और कम फल देने वाले पेड़ों को उन्नत बनाने में क्रांतिकारी साबित हो सकती है।
7. सवाल-जवाब और निष्कर्ष
प्रशिक्षण के अंत में एक संवाद सत्र आयोजित किया गया, जहाँ वन पंचायत सदस्यों ने अपनी जमीनी समस्याओं (जैसे जंगली जानवरों का आतंक और पानी की किल्लत) को विशेषज्ञों के सामने रखा। विशेषज्ञों ने इन समस्याओं के व्यावहारिक और वैज्ञानिक समाधान सुझाए।
निष्कर्ष: भविष्य की राह
यह तीन दिवसीय कार्यशाला कैम्पटी और आसपास के क्षेत्रों के लिए एक 'गेम-चेंजर' साबित होगी। जब वन कर्मी और स्थानीय समुदाय वैज्ञानिक तकनीकों से लैस होंगे, तभी उत्तराखंड के जंगलों को सुरक्षित और समृद्ध रखा जा सकेगा।
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