उत्तराखंड इतिहास: चंद राजवंश (Chand Dynasty) का उदय और संस्थापक - भाग 1

कुमाऊँ का चंद राजवंश एवं उनका उदय भाग-1 

  • ​चंद वंश की स्थापना चम्पावत के राजबुंगा किले से हुई
  • ​चंदों का मूल निवास प्रयाग में गंगापार झूसी था
  • काली कुमाऊँ चम्पावत का उपनाम था
  • ​चंद वंश के इतिहास स्रोत बालेश्वर मंदिर में क्राच्चल्लदेव का लेख व चमोली का गोपेश्वर का त्रिशूल लेख एवं पिथौरागढ़ के आनंदपाल का बास्त ताम्रपत्र आदि हैं
  • मझेड़ा ताम्रपत्र से चंद व बम् शासकों के सम्बन्ध का पता चलता है एवं बास्त ताम्रपत्र मांडलिक राजाओं की सूची से सम्बन्धित है
  • पार्श्व ताम्रपत्र का सम्बन्ध चंद शासक विजयचंद से है
  • मूनाकोट ताम्रपत्र चंद शासकों के करों से सम्बन्धित था
  • ​चंदों की प्रारंभिक राजधानी चम्पावत में चम्पावती नदी के तट पर स्थित थी और बाद में अल्मोड़ा राजधानी बनायी गयी
  • देबीसिंह या देवीचंद के समय देवीपुर राजधानी बनायी गयी
  • ​चंदों के समय राजमहल को बौमठल कहा जाता था
  • ​चंद राजाओं की वंशावली मानोदय काव्य में दी गयी है

1. {चंद शासक सोमचंद} 

  • ​चंद वंश की स्थापना को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है, लेकिन अनुमानतः कस्तूरी शासन के अवसान पर ही चंद वंश की उत्पत्ति हुई
  • ​सोमचंद ने चंद वंश की स्थापना 1025 ई० से 1025 ई० के बीच की होगी
  • ​सोमचंद भगवान शिव का उपासक था, 10वीं शताब्दी में लोहाघाट के आसपास सूई राज्य था जिस पर ब्रह्मदेव शासन कर रहा था
  • बद्रीदत्त पांडे के अनुसार सोमचंद 27 आदमियों को लेकर श्रीबदरी नारायन की यात्रा पर आए हुए थे जिसे काली कुमाऊँ के सूई शासक ब्रह्मदेव ने 15 बीघा जमीन दहेज में दी थी
  • ​ब्रह्मदेव ने अपनी पुत्री का विवाह सोमचंद से कराया और दहेज स्वरूप चंपावत की कोतवाल छावनी भेंट की
  • ​सोमचंद ने चंपावत में राजबुंगा किले का निर्माण कराया और इसी किले से सोमचंद ने चंद वंश की स्थापना की
  • ​सोमचंद कन्नौज नरेश का भाई था जो प्रयाग के शासक चंदपाल फूह का वंशज था जिसकी राजधानी कन्नौज थी
  • ​एटकिंसन, वाट्सन व बद्रीदत्त पांडे ने चंदों का मूल निवास प्रयाग के निकट झूसी बताया जबकि इलियट के अनुसार चंदों का मूल निवास झाँसी था।
  • ​सोमचंद ने चार किलेदार नियुक्त किए कार्की, बोरा, तड़ागी एवं चौधरी मूलतः नेपाल के थे, जिन्हें बारहाल या बारकाली कहते थे
  • ​सोमचंद ने सर्वप्रथम डोनकोट (दोनकोटा) के रावत राजा को परास्त किया, सोमचंद ने मेहरा व फर्त्यालों को मंत्री व सेनापति बनाया जिसका मुख्य सेनापति कालू तड़ागी था
  • ​मेहरा लोग कठलगढ़ व फर्त्याल लोग डुंगरी में रहते थे
  • ​सोमचंद ने विजित रूप से पंचायती राज व्यवस्था चलाई थी
  • ​सोमचंद ने ग्रामों में बूढ़ा व सयानों की नियुक्ति की, अतः कुमाऊँ में पंचायती राज व्यवस्था का जनक सोमचंद को माना जाता है
  • ​चंद शासक सोमचंद ने समाज को 8 वर्गों में विभक्त किया था
  • ​सोमचंद डोटी के राजा को कर दिया करता था
  • ​डोटी के राजा मल्लखर्षी थे, जिन्हें रेका राजा कहा जाता था
  • ​सोमचंद के समय जयदेव मल्ल डोटी का राजा था
  • ​मल्लवंश का प्रथम राजा बामदेव था, जिसकी राजधानी चंपा थी बामदेव ने अपनी राजधानी का नाम अपनी ईष्टदेवी चंपावती के नाम पर रखा था
  • ​सोमचंद का उत्तराधिकारी व दूसरा चंद शासक आत्मचंद कत्यूरी रानी से उत्पन्न पुत्र था जिसने 20 वर्षों तक शासन किया
  • ​तीसरे चंद शासक पूर्णचंद ने 1066 ई० से 1084 ई० तक शासन किया।

2. (इन्द्रचंद व उनके उत्तराधिकारी)

  • ​चौथा चंद शासक इन्द्रचंद ने नेपाल मार्ग से चीन के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित किए
  • ​एटकिंसन के अनुसार इन्द्रचंद ने रेशम उत्पादन व रेशमी वस्त्र बनाने का कार्य प्रारम्भ किया, रेशमी वस्त्रों के रंग को पक्का करने के लिए कुमाऊँ में झूठी खबरें फैलाने की प्रथा थी जिसे पटरंगवाली कहा जाता था
  • ​इन्द्रचंद राजा बड़ा घमण्डी था जो अपने को इन्द्र के समान समझता था
  • ​इन्द्रचंद का उत्तराधिकारी संसार चंद था जिसके पश्चात् चंद शासक क्रमशः सुधाचंद, हरिश्चंद्र, वीणाचंद बने। वीणाचंद कुमाऊँ का विलासी राजा था जिसको खस राजाओं ने पराजित किया था
  • वीरचंद ने खस राजाओं को हरा कर पुनः राज्य पर कब्जा किया
  • ​अशोकचल्ल के समय चंद शासक वीर चंद था जिसकी मृत्यु 1206 ई० में हुई
  • वीरचंद का उत्तराधिकारी नरचंद लगभग 1236 ई० में गद्दी पर बैठा था

अशोकचल्ल

  • ​डोटी के राजा अशोकचल्ल ने कमादेश या काली-कुमाऊँ व केदारभूमि पर आक्रमण कर कत्यूरी राज्य के कुछ भागों को अपने अधीन कर लिया था
  • ​अशोकचल्ल के आक्रमण की जानकारी 1191 ई० के गोपेश्वर त्रिशूल लेख1209 ई० के बहाहाट त्रिशूल लेख से मिलती है
  • पुरुषोत्तम सिंह के बोधगया शिलालेख में अशोकचल्ल को खसदेश का राजाधिराज कहा गया है
  • पुरुषोत्तम पट्ट के बोधगया अभिलेख से पता चलता है कि कमादेश या काली-कुमाऊँ पर अशोकचल्ल के सामंत पुरुषोत्तम सिंह के वंशजों का शासन था जो सम्भवतः 1180 ई० से 1210 ई० के बीच था जिसकी राजधानी चक्रवाल थी
  • ​गोपेश्वर लेख में अशोक चल्ल को गौड़ वंश एवं बैराथ कुलनेपाल के दुल्लु का निवासी बताया और बौद्ध धर्म का अनुयायी था
  • ​अशोकचल्ल का राज्य बादाहाट से लेकर बैराथ या प० नेपाल तक एवं दक्षिण में शिवालिक पहाड़ी तक विस्तृत था
  • ​अशोकचल्ल का राज्य 3 क्षेत्रों में विभक्त था – बैराथ, कमादेश, केदारभूमि |

क्राचल्लदेव

  • अशोकचल्ल की मृत्यु के बाद छोटी पर क्राचल्लदेव का आधिपत्य हो गया था, जो संभवतः 1212 ई. के आस-पास था।
  • ​क्राचल्लदेव ने काली-कुमाऊँ में स्वतंत्र हो चुके खस राजाओं को पुन: विजित कर अल्प समय के लिए कमादेश पर अपना अधिकार कर लिया था।
  • ​चंपावत के बालेश्वर मंदिर के दानपात्र से क्राचल्लदेव का 1223 ई. का एक लेख प्राप्त हुआ।
  • बालेश्वर लेख में क्राचल्लदेव के 10 माँडलिक राजाओं का नाम मिलता है, जिनमें से तीन चंदवंशीय माँडलिकों का उल्लेख किया गया था।
  • बास्ते ताम्रपत्र (पिथौ०) में मोहनथापा नामक माँडलिक का उल्लेख है, जो मूलतः नेपाल का था।
  • माँडलिक ऐसे सामंत होते थे जो अपने अधिपति के अधीन शासन चलाते थे।
  • दूलू स्तंभ लेख में क्राचल्लदेव के पुत्र का नाम अशोकदेव मिलता है।
  • ​क्राचल्लदेव के समय निर्माण की दो शैलियाँ कत्यूर शैलीनाग शैली प्रचलित थी।
  • कत्यूर शैली – इसमें मंदिर का शिखर उभरा व ऊँचा होता था।
  • नाग शैली – इसमें मंदिर का शिखर नीचे होता है।

3. चंद शासक थोहरचंद

  • रिपोर्ट ऑन कुमाऊँ एण्ड गढ़वाल (1813 ई०) के लेखक डब्ल्यू फ्रेज़र ने हर्षदेव जोशी के विवरण के आधार पर चंद वंश का संस्थापक थोहरचंद को माना है
  • किंगडम ऑफ़ नेपाल (1881 ई०) के लेखक फ्रांसिस हैमिल्टन ने लिखा कि थोहरचंद झूँसी से आकर नेपाल राजा के यहाँ नौकरी की थी।
  • हर्षदेव जोशी थोहरचंद को कुमाऊँ के चंद वंश का संस्थापक मानते हैं
  • एटकिंसन के अनुसार थोहरचंद का राज्यारोहण 1261 ई० में हुआ और उसने 1281 ई० तक शासन किया।
  • ​थोहरचंद का उत्तराधिकारी कल्याण चंद प्रथम था जिसके बाद क्रमशः त्रिलोकचंद व अभयचंद का नाम आता है।
  • अभयचंद पहला चंद शासक था जिसका प्रामाणिक सूचना उसके स्वयं के अभिलेखों से मिलती है
  • ​अभयचंद का प्राचीनतम ज्ञात अभिलेख 1360 ई० का चम्पावत के मानेश्वर नौले से प्राप्त हुआ।
  • ​कर्मचंद 1 वर्ष शासन करने के बाद मणि कोटी राजा के पास चला गया जिसके पश्चात ज्ञानचंद गद्दी पर बैठा

4. ​ चंद शासक गरुड़ ज्ञानचंद

  • 29वाँ चंद शासक गरुड़ ज्ञानचंद ने 1365 ई० से 1420 ई० तक शासन किया जो चंद राजाओं में सर्वाधिक था।
  • 1378 ई० का एक ताम्रपत्र मिला, जिसमें अभयचंद का वार्षिक श्राद्ध ज्ञानचंद के द्वारा कराने का विवरण मिलता है
  • ज्ञानचंद पहला चंद शासक जो दिल्ली दरबार गया, जिसके समय दिल्ली का सुल्तान फ़िरोज़शाह तुगलक था।
  • फ़िरोज़शाह तुगलक ने ज्ञानचंद को गरुड़ की उपाधि दी, तथा तराई का क्षेत्र ज्ञानचंद को सौंपा था
  • एटकिंसन के अनुसार उस समय सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक था लेकिन मुहम्मद बिन तुगलक का कार्यकाल 1325–51 ई० था।
  • ज्ञानचंद के समय तराई भाभर क्षेत्र में कठेहरियों का शासन था।
  • ​ज्ञानचंद का राजचिन्ह गरुड़ था और वह विष्णु उपासक था।
  • सेरा खड़कोट ताम्र पत्र में ज्ञानचंद को राजधिराज महाराज कहा गया।
  • ​और सेरा का विजेता भी ज्ञानचंद को कहते हैं।
  • मझेड़ा ताम्रपत्र के अनुसार ज्ञानचंद के समय एक मात्र सामंत राजा विजयबम था।
  • गोबासा ताम्रपत्र में ज्ञानचंद ने 1418 ई० में देवराज तिवाड़ी को एक ग्राम की वृत्ति दान में दी थी।
  • ​दरबारी विकल्पद जैशाह कमलेखी खवास के कहने पर नीड़ू कटैत के दो बेटों की आँखें निकलवा दी
  • नीलू कटायत ज्ञानचंद का वीरवान सेनापति था जो कपरौली गाँव का रहने वाला था जिसे राजा ने कुम्या खिल्लत दी थी जो एक प्रकार की पोशाक होती थी।
  • गरुड़ ज्ञानचंद के उत्तराधिकारी क्रमशः हरिश्चंद्र, द्वानचंद थे।

5. चंद शासक उद्यनचंद

  • ​गरुड़ ज्ञानचंद ने नीलू कटायत को धोखे से मार दिया था जिस अत्याचार पूर्ण कार्य से उद्यनचंद को आत्मग्लानि हुई जिस कारण इन्होने कई स्थानों में मंदिर व नौले बनवाए
  • ​बद्रीदत्त पांडे के अनुसार उद्यनचंद ने चंपावत में बालेश्वर का मंदिर बनवाया था और 1 साल की मालगुजारी तमाम प्रजा की माफ़ कर दी थी
  • ​1423 ई० के बालेश्वर मंदिर ताम्रपात्र का सम्बन्ध विक्रमचंद से था जिसने उद्यनचंद द्वारा शुरू बालेश्वर मंदिर का कार्य पूर्ण कराया जिसमें ब्राह्मण कुंज शर्मा तिवारी ने योगदान दिया था।
  • बालेश्वर ताम्रपत्र में उद्यनचंद ने गुजराती ब्राह्मण कुंज शर्मा तिवारी को भूमिदान की बात सामने आयी है जिसमें साक्षीगण के रूप में पंतनबीसी का उल्लेख मिलता है जिसका अर्थ वर्तमान के सन्दर्भ में कचहरी से है।


6. चंद शासक भारतीचंद

  • भारतीचंद 35वां चंद शासक था।
  • ​वह 1437 ई० में गद्दी पर बैठा, जिसका कार्यकाल 1437 ई०–1477 ई० तक रहा।
  • ​भारतीचंद का कार्यकाल कुमाऊँ के पवाड़े/इतिहास में प्रसिद्ध है।
  • ​पवाड़ों में भारतीचंद व कुमाऊँ की वीरांगना भागांधी-ध्यान के द्वन्द्व – युद्ध का वर्णन मिलता है।
  • ​भारतीचंद चंद वंश का सबसे पराक्रमी व साहसी राजा था।
  • ​भारतीचंद ने डोटी की दासता से छुटकारा पाने के लिए डोटी राज्य पर आक्रमण किया।
  • ​भारतीचंद की सेना में कटक में सभी जाति एवं धर्म के लोग थे।
  • ​डोटी आक्रमण के दौरान चंद सेना का पहला पड़ाव सोर के कटकुनौला में था।
  • ​दूसरा पड़ाव काली नदी के किनारे बाली-चौड़ में था।
  • ​भारतीचंद ने 12 वर्षों तक डोटी पर घेरा डाला था।
  • ​भारतीचंद को डोटी पर विजय 1451–52 ई० में मिली।
  • हुड़ेती ताम्रपत्र के अनुसार भारतीचंद ने 1451 ई० में एक गाँव दान में देने का वर्णन मिलता है।
  • डोटी अभियान के तहत नायक जाति की उत्पत्ति हुई थी।
  • ​नायक जाति के लोग चंद सैनिकों की अवैध संतान थीं।
  • ​भारतीचंद ने अपने पुत्र रत्नचंद की सहायता से सोर, सीरा, थल आदि पर अधिकार कर लिया।
  • सोर या पिथौरागढ़ में मल्ल वंश का शासक बमशाह था।
  • ​सोर के मल्लराजा विजयबम की जानकारी मझेड़ा ताम्रपत्र से मिलती है जिसका शासन भारतीचंद ने समाप्त कर दिया था।
  • ​सोर से मल्लों का प्राचीनतम ताम्रपत्र 1337 ई० का प्राप्त हुआ।
  • खेतीखान ताम्रपत्र में भारतीचंद के दूसरे पुत्र सुजान कुंवर का उल्लेख मिलता है।

7. चंद शासक रत्नचंद

  • लोहाघाट व हुडेती ताम्रपत्र में रत्नचंद का उल्लेख मिलता है
  • भारती चंद के बाद उसका पुत्र रत्नचंद 1477 ई० में गद्दी पर बैठा जिसके समय छोटी में नागमल्ल ने विद्रोह किया जिसका शासन 11 वर्ष तक रहा
  • रत्नचंद ने नागमल्ल को परास्त कर पुनः छोटी पर शाही वंश का अधिकार स्थापित कराया था
  • रत्नचंद ने थल के राजा सूर सिंह मेहरा को भी परास्त किया
  • रत्नचंद पहला चंद शासक जिसने भूमि बंदोबस्त का कार्य किया एवं जिंदा केताल नामक भूमबंदोबस्त अधिकारी की नियुक्ति की

​ 8. चंद शासक कीर्तिचंद

  • रत्नचंद का पुत्र कीर्तिचंद 1488 ई० से 1506 ई० तक कुमाऊँ की गद्दी पर बैठा जो नाथ सम्प्रदाय का अनुयायी था
  • कीर्तिचंद ने गढ़वाल शासक अजयपाल को पराजित किया था
  • कीर्तिचंद ने राज्य विस्तार में बारामंडल, बिसोद, खगमराकोट, स्यूनरा, कोटली, कैडारो-बोरारो आदि क्षेत्र को अपने राज्य में मिलाया
  • राजा कीर्तिचंद के समय नागनाथ सिद्ध नाम के एक योगीश्वर चंपावत आए थे
  • कीर्तिचंद के बाद क्रमशः प्रतापचंद, ताराचंद, मानिकचंद एवं भीष्मचंद आदि राजा हुए।

9.चंद शासक भीष्मचंद

  • ​भीष्मचंद 1512 ई० से 1530 ई० तक गद्दी पर बैठा जिसका 1514 ई० का एक ताम्रपत्र मिला
  • ​भीष्मचंद ने खगमरा किले का निर्माण कराया एवं आलम नगर की नींव डाली थी
  • ​भीष्मचंद ने ताराचंद के पुत्र कल्याण चंद को गोद लिया था
  • ​भारत में बाबर आक्रमण के समय भीष्मचंद कुमाऊँ का शासक था
  • ​गरजुआ नामक खसिया मुखिया ने भीष्मचंद का वध किया था ।
    • रुद्रचंद के बाद 1597 ई० में उसका छोटा पुत्र लक्ष्मीचंद गद्दी पर बैठा। जिसका नाम मानोदय काव्य में लखिम मिलता है।
    • मुनाकोट ताम्रपत्र में लक्ष्मीचंद का नाम लछमन मिलता है।
    • ​लक्ष्मीचंद को लखुली बिराली उपनाम से जाना जाता था।
    • लखुली बिराली उपनाम इसलिए था कि वह मुगलों के सम्मुख भीगी बिल्ली बनकर रहता था।
    • जहाँगीरनामा में लक्ष्मीचंद को सबसे धनी शासक कहा गया है।
    • ​लक्ष्मीचंद ने गढ़वाल पर 7 बार असफल आक्रमण किया और आठवें आक्रमण के समय गढ़वाली सेनापति खलड़ सिंह मारा गया था।
    • ​लक्ष्मीचंद ने न्यौवाली व बिष्टावाली नामक कचहरियाँ बनवाईं, जिसमें न्यौवाली कचहरी समस्त जनता के लिए और बिष्टावाली कचहरी फौजदारी मामलों में न्याय के लिए थी।
    • ​लक्ष्मीचंद ने बड़े-बड़े बाग-बगीचे लगवाए जिनमें प्रमुख नरसिंह बाड़ी, कबिना तथा लक्ष्मीश्वर आदि बगीचे थे।
    • ​लक्ष्मीचंद ने किसी टणटा को 4 थाली या 8 नाली भूमि दान में दी।
    • रौत बहादुरों के पुरस्कार के रूप में दी जाने वाली जमीन को सब्जियों पर उगाया करते थे।
    • जू-लिया व सिरती नामक कर लक्ष्मीचंद द्वारा लगाए गए थे।
    • ​लक्ष्मीचंद ने बागेश्वर के बागनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार 1602 में किया।
    • ​लक्ष्मीचंद के समय राज्य-कर्मचारियों की तीन श्रेणियाँ बनाई गई थीं:
      1. सरदार - परगने का शासक
      2. फौजदार - सेना का अधिकारी
      3. नेगी - राज्य के छोटे कर्मचारी होते थे जो सरदार व फौजदार के अधीन कार्य करते थे, इन्हें अनाज के रूप में दस्तूर (नेग) मिलता था।
    • ​लक्ष्मीचंद के समय राजा के राजसी कपड़े, जूते, निजी हथियार रखने वाले आवास को रंजवाल कहा जाता था जिसकी रखवाली के लिए अलग से अधिकारी की नियुक्ति होती थी।
    • उठवाल नामक कर्मचारी का कार्य गाय-भैंस से ताजा दूध, दही एवं मक्खन दरबार में पहुँचाना था।

10. चंद शासक बालो कल्याण चंद 

बालो कल्याण कालीन ताम्रपत्र कालीमठ, पिथौरागढ़ से मिले

  • कल्याण चंद 1545 ई० से 1565 ई० तक गद्दी पर बैठा
  • बालो कल्याण चंद भीमचंद का गोद लिया पुत्र था जिसके विस्तृत विजय के कारण सर्वप्रथम महाराजाधिराज की उपाधि थी
  • कल्याण चंद के समय राजधानी अल्मोड़ा पूर्ण रूप से तैयार हो गयी थी और अल्मोड़ा स्थित राजधानी को राजापुर कहा
  • कल्याण चंद ने मनकोट राज्य को चंद राज्य में मिलाया
  • गंगोली व दानपुर पर कब्जा बालो कल्याण चंद के समय हुआ
  • कल्याण चंद अल्मोड़ा में लालमंडी किले का निर्माण करवाया और अल्मोड़ा में नेलापोखर किले का निर्माण भी कराया।
  • बालो कल्याण चंद का विवाह डोटी के मल्ल वंश की राजकुमारी के साथ हुआ
  • विवाह के बाद रेका राजा हरिमल्ल ने अपनी बहन को दान स्वरूप सौर प्राप्त दिया लेकिन पूर्ण चंद सौर प्राप्त को भी चाहता था
  • ​अपने पिता की इच्छा पूरी करने के लिए रुद्रचंद ने सीरागढ़ के किले पर 7 बार आक्रमण किया
  • रुद्रचंद ने सेनापति पुरुषोत्तम पंत की सहायता से 1581 ई० में सीरागढ़ का किला जीता
  • इस्लाम शाह सूर के शत्रु खवास खाँ को चंद राज्य में शरण का सही समय ज्ञात नहीं है उस समय माणिकचंद या कल्याण चंद में से कोई भी शासक हो सकता है
  • बद्रीदत्त पाण्डे के अनुसार खवास खाँ ने माणिकचंद के समय कुमाऊँ में शरण ली
  • बद्रीदत्त पांडे के अनुसार माणिकचंद ने इस्लाम शाह सूर के शाही हुक्म के जवाब में लिखा था कि मैं उस आदमी को किस प्रकार कैद कर सकता हूँ जिसने मेरी शरण माँगी है। जब तक मुझ में दम है, मैं ऐसे नीच कर्म का अपराधी नहीं हो सकता।
  • राजा बालो कल्याण चंद ने अपने शासनकाल के दौरान स्थानीय स्वायत्तता लागू की
  • ​महाराष्ट्र के लेखक अनन्तदेव ने अपने ग्रंथ स्मृति कौस्तुभ में कल्याण चंद को प्रज्ञा हितैषी बताया।

​🌟 शक्ति गुंसाई

  • शक्ति गुंसाई जन्मांध होने के कारण इसे कुमाऊँ का धृतराष्ट्र कहा जाता है।
  • ​शक्ति गुंसाई, लक्ष्मीचंद का बड़ा भाई था।
  • ​लक्ष्मीचंद के समय नागरिक प्रशासनिक व्यवस्था इनकी नीतियों से निर्धारित होती थी।
  • ​इन्होंने दारमा घाटी के शौका जनजाति के अधिकार एवं कर्त्तव्य निर्धारित किए और उनसे बन्दोबस्त के बदले अनेक तिब्बती वस्तु राजदरबार में पहुँचाने का करार किया था।
  • ​उन्होंने राजधानी में बन्दोबस्ती कार्यालय की स्थापना की थी।

लक्ष्मीचंद के उत्तराधिकारी

  • ​लक्ष्मीचंद के बाद दलीप चंद राजा बना जिसने 1621 ई० से 1624 ई० तक शासन किया।
  • ​दलीप चंद की मृत्यु क्षय रोग के कारण हुई।
  • ​दलीपचंद के बाद विजयचंद राजगद्दी पर बैठा।
  • एटकिंसन अनुसार विजयचंद का विवाह बुलंद शहर स्थित अनूप शहर के बडगुजर की पुत्री से हुआ।
  • ​विजयचंद के समय राज सत्ता सुखराम कार्की व पीरू गुंसाई के हाथों में थी। सामाजिक सम्बन्धों के कारण सुखराम कार्की ने विजयचंद को मरवा दिया था।
  • ​विजयचंद की हत्या के बाद महरा व फत्र्याल संघर्ष प्रारम्भ हुआ, जिसमें महरों की जीत हुई और महरा धड़े ने ही त्रिमलचंद को शासक बनाया।
  • त्रिमलचंद ने सुखराम कार्की को मरवा दिया और पीरू गुंसाई को देश निकाला दिया।
  • 'पौरा सम्मल विद्रोह' त्रिमलचंद के शासन काल में हुआ।
  • ​त्रिमलचंद ने 1630 में बागेश्वर में मूर्ति स्थापित की।
  • ​त्रिमलचंद ने काकूवामोर युद्ध (1634 ई०) में महीपतिशाह को पराजित किया था तथा उसे मुक्ति प्रदान की थी।
  • 1625 ई० में विजयचंद की मृत्यु के बाद त्रिमलचंद का राज्यारोहण हुआ, जिसका कार्यकाल 1625 ई० से 1638 ई० तक रहा।
  • गढ़यूड़ा ताम्रपत्र में त्रिमलचंद को युवराज कहा गया है जिसने 1616 ई० से 1621 ई० तक युवराज के रूप में कार्य किया और त्रिमलचंद का सेनापति गढ़यूड़ा था।
  • ​विजयचंद की हत्या के पीछे रसोइयों का हाथ था, इसलिए त्रिमलचंद ने कपरोली के कतलों को रसोइया नियुक्त किया और साथ-साथ रसोई से सम्बंधित नियम भी बनवाए थे।

चंद शासक बाज बहादुर चंद

  • 50वां चंद राजा बाज बहादुर चंद जो त्रिमलचंद का उत्तराधिकारी था।
    • ​इसका कार्यकाल 1638 ई० से 1677 ई० तक था।
  • बाज बहादुर चंद चरवाहे से राजा बनने वाला एकमात्र चंद शासक था जिसके पिता का नाम नीलू गुंसाई था।
  • ​बाज बहादुर चंद मूल्यांकन वस्तु जैसे – चँवर, कस्तूरी, सोना-चाँदी के बर्तन आदि लेकर मुगल बादशाह शाहजहाँ के दरबार पहुँचा।
  • ​शाहजहाँ ने इसे बहादुर व ज़मींदार की उपाधि दी थी।
  • ​चौरासी माल पर कटेहरी राजपूतों ने अधिकार कर लिया था।
  • चौरासी माल या नौलखिया माल या तराई एक 84 कोस लंबे भूभाग से चंद राजाओं को प्रतिवर्ष 9 लाख आय होती थी।
  • ​शाहजहाँ ने बहादुरचंद को चौरासी माल का फरमान दे दिया था।
  • ​एटकिंसन के अनुसार बाज बहादुरचंद मुगल दरबार को खुश रखने के लिए प्रत्येक परिवार से 1 रुपये कर लेता था।
  • ​बाज बहादुर चंद ने तराई क्षेत्र में बाजपुर नगर की स्थापना की।
  • ​बाज बहादुर चंद ने पंवार राज्य पर विजय के प्रतीक रूप में नंदा देवी की मूर्ति गढ़वाल से लाकर अल्मोड़ा किले में स्थापित की।
  • ​मुगल बादशाह ने गढ़वाल आक्रमण के लिए 1655 ई० में खलीलुल्ला के नेतृत्व में सेना भेजी, जिसकी मदद बहादुर चंद ने की थी।
  • ​बाज बहादुर चंद ने कत्यूरी राजकुमारों के गढ़ मनीला-गढ़ पर आक्रमण किया जिसके बाद कत्यूरी कुँवरों ने गढ़वाल के पूर्वी भाग में लूट-पाट मचाई जिनको भगाने के लिए तीलू रौतेली को हथियार उठाने पड़े थे।
  • बाज बहादुर चंद ने तिब्बत पर अभियान कर करके हूणियों का दमन किया, और मानसरोवर यात्रा व भोटिया व्यापार में बाधाओं से मुक्त किया।
  • ​बाज बहादुर चंद ने कैलाश मानसरोवर के तीर्थ यात्रियों के लिए 1673 में मुठ्ठे भूमि दान की।
  • ​बाज बहादुर चंद ने भोटिया व शौकाओं द्वारा तिब्बत को दी जाने वाली दस्तूर पर रोक लगा दी।
    • ​मुठ्ठे भूमि वह भूमि होती है जिसे मंदिरों की देखभाल और उनमें खर्च होने वाले अनाज आदि की व्यवस्था हेतु पुजारियों को दी जाती थी
  • ​बाज बहादुर चंद ने 1669 ई० में सोर की यात्रा की, उस समय सोर को खंडायत का परगना कहा जाता था।
  • ​सोर में उर्ग गाँव को भारतीलंद ने सदानंद जोशी को दे रखा था।
    • ​ताम्रपत्र में सदानंद जोशी को लटोला राठ कहा गया।
  • ​बहादुरचंद ने रतन जोशी को उर्ग गाँव के बदले तल्ला रयाँसी में एक ज्यूला जमीन दी।
  • ​बाज बहादुर चंद ने भोटियों व हूणियों (तिब्बतियों) से सिरती नामक कर लिया
    • ​कुमाऊँ में जजिया कर लगाने वाला एकमात्र चंद राजा था।
  • ​पिथौरागढ़ के थल में एक हथिया देवाल बाज बहादुर चंद ने बनवाया जिसकी बनावट एलोरा के कैलाश मंदिर के समान है।
  • ​बाज बहादुर चंद ने घोड़ाखाल में गोलू देवता का मंदिर बनाया एवं हरियाडूँगरी में शिव मंदिर का निर्माण कराया।
  • ​बाज बहादुर चंद का एक चित्र न्यूयार्क संग्रहालय में रखा गया है।
  • ​बाज बहादुर चंद की उम्र के अंतिम वर्षों में एक कहावत है कि 'बरस भयो अस्सी, बुद्धि गयी नस्सी'
  • ​बाज बहादुर चंद के समय डोटी का राजा देवापाल था।
  • ​बाज बहादुर चंद ने दरबार को मुगल दरबार के अनुरूप बनाने का प्रयास किया और कर्मचारियों का नामकरण कामस्वरूप किया जैसे – पानी भरने वाले को पनहरू, मंदिरों की रक्षा करने वाले को मठपाल, राजपरिवार को जगाने वाले हरबोला आदि।
  • ​बाज बहादुर चंद ने जजिया कर के समान व्यक्ति कर या पोल टैक्स लगाया था।
  • ​बहादुरचंद को तराई भाबर का फरमान मिलने के बाद उसने वहाँ शासन की सुविधा के लिए तराई क्षेत्र को पट्टियों व ग्रामों में विभक्त किया।
  • ​बाज बहादुर चंद ने 'मागा कर' लगाया था।

चंद शासक उद्योत चंद

  • बाज बहादुर चंद की मृत्यु के बाद 1678 ई० में उद्योतचंद गद्दी पर बैठा।
  • ​उद्योतचंद को इतिहासकार रुद्रदत्त पंत ने तपस्वी शासक बताया जिसका शासन काल 1678 ई० से 1698 ई० तक था।
  • ​उद्योत चंद को धाईमाता की बीमारी थी इसका राजवैद्य वरदेव जोशी था उद्योत चंद का प्रथम सेनापति हिरू देउबा था।
  • ​उद्योत चंद का दूसरा सेनापति शिरोमणि जोशी था जिसे सोर का नेगी भी कहा जाता है।
  • बद्रीदत्त पांडे ने उद्योत चंद को सबसे प्रतापी चंद शासक माना।
  • ​उद्योतचंद के समय मेदनीशाह ने दूनागिरी एवं द्वाराहाट पर आक्रमण किया था।
  • ​उद्योत चंद ने 1678 ई० में बधाण गढ़ का किला जीता।
  • ​बधाण गढ़ के युद्ध में चंद सेनापति मैसू शाह मारा गया।
  • ​उद्योतचंद ने राज्य में स्थायी सैनिक छवनियाँ बनाई।
  • ​उद्योत चंद के समय मराठा राजकवि मतिराम चंद दरबार में आया था जिसने फूलमंजरी नामक ग्रंथ लिखा था, राजकवि मतिराम मराठा शासक शाहू के दरबार में राजकवि थे।


उद्योत चंद

  • ​उद्योत चंद को रूदापुर के क्षेत्र को तराई भाभर कहा जाता था और उद्योतचंद ने कोटा भाभर में आम के बगीचे लगवाए थे।
  • ​उद्योतचंद ने तल्ला महलरंगमहल का निर्माण कराया।
  • ​उद्योतचंद ने त्रिपुरा सुन्दरी मंदिर और पर्वतीश्वर मंदिर अल्मोड़ा में बनवाया था।
  • ​उद्योतचंद के समय माल का सीकदार जगन्नाथ बरेसीरा का सीकदार गंगाराम था और सीरा को दशैली डोटी कहते थे।
  • ​उद्योतचंद ने दशौं का छाजा या दशहरा भवन का निर्माण अपने महल में किया था।
  • ​उद्योतचंद ने बरावरों में सोमेश्वर महादेव का मंदिर बनवाया था।
  • ​उद्योतचंद के समय लालमंडी किले में ऋद्धिगिरि गुसाईं बाबा रहते थे, जिनका राजा से अच्छे संबंध थे। ​
  • ​➤ उद्योत चंद का डोटी अभियान

    • भारतीचंद के बाद दूसरा चंदराजा जिसने डोटी पर आक्रमण किया और डोटी विजय के बाद उद्योत चंद 1682 ई० में प्रयाग के रघुनाथपुर घाट में स्नान करने गया था।
    • ​उद्योतचंद की अनुपस्थिति में डोटी राजा देवपाल ने काली कुमाऊँ पर कब्जा किया था।
    • ​उद्योतचंद ने 1683 ई० में डोटी की ग्रीष्मकालीन राजधानी अजमेरगढ़ पर अधिकार किया था जिस अभियान में चंद सेनापति हिरू देउवा मारा गया जिसके वंशजों को राजा ने आठ गाँव रौत या बहादुरी में दिए थे।
    • ​डोटी के राजा की शीतकालीन राजधानी जूराइल–दिपाइल कोट थी, जो सेटी नदी के किनारे स्थित था।
    • 1688 ई० में उद्योतचंद ने खेरागढ़ के किले पर अधिकार कर लिया जिसके बाद खेरागढ़ की संधि देवपाल के साथ हुई जिसमें डोटी नरेश को कर देने के लिए बाध्य किया।
    • 1696 ई० को डोटी राजा ने कर देना बंद कर दिया जिस कारण उद्योत चंद ने तीसरी बार जूराइल–दिपाइल कोट पर आक्रमण किया जिसमें चंदों की बुरी तरह पराजय हुई और इस युद्ध में शिरोमणि जोशी मारा गया।
    • ​उद्योत चंद ने युद्ध न करने का वचन लेकर शांति की तलाश में चल पड़ा था।

चंद शासक ज्ञानचंद द्वितीय

  • ​ज्ञानचंद द्वितीय ने 1698 ई० से 1708 ई० तक शासन किया
  • ​1699 ई में इसने बधानगढ़ पर विजय प्राप्त की
  • ​ज्ञानचंद द्वितीय ने बधाण गढ़ से नंदादेवी की स्वर्ण प्रतिमा अपने साथ लेकर अल्मोड़ा के नंदादेवी मंदिर में स्थापित की
  • ​ज्ञानचंद द्वितीय के समय गढ़वाल राजा फतेहशाह ने चंद राज्य के पाली परगने को लूटा
  • ​1703 में दुधौली का युद्ध ज्ञानचंद द्वितीय व फतेहशाह के बीच हुआ
  • ​1704 ई० में ज्ञानचंद डोटी पर अभियान अपने पिता उद्योतचंद की हार का बदला लेने के लिए किया था
  • ​ज्ञानचंद का युद्ध डोटी नरेश से कुमाऊँ सीमा पर मलेरिया ग्रस्त भाबर में हुआ डोटी नरेश हारकर भाग गया, किन्तु इसके सैनिकों को मलेरिया हो गया ।

ज्ञानचंद, जगतचंद और अन्य तथ्य

  • ज्ञानचंद ने कर्पूर घाटी में बद्रीनाथ मंदिर बनवाया और तराई-भाबर क्षेत्र में आम के बगीचे लगवाए।
  • ज्ञानचंद द्वारा सोर व सीरा क्षेत्र में बनवाए गए मंदिरों को देवल या घोल कहा जाता था।

​✨ चंद शासक जगतचंद

  • जगतचंद के समय को कुमाऊँ का स्वर्ण काल माना जाता है।
  • ​जगतचंद का कार्यकाल 1708 ई० से 1720 ई० तक था।
  • तराई-भाबर से 9 लाख रु० की आय जगतचंद के समय होती थी।
  • जगतचंद स्वयं मिलनसार व्यक्ति एवं प्रजा का हितैषी राजा था।
  • जगतचंद ने राजकाज के पहले वर्ष लोहाबागड़ व बधानगढ़ से गढ़ सेना को मार भगाया।
  • ​श्रीनगर में जगतचंद व फतेहशाह के बीच युद्ध हुआ जिसमें गढ़नरेश देहरादून भाग गया। उसने श्रीनगर में कब्जा कर एक ब्राह्मण को दान में दे दिया था।
  • ​जगतचंद के समय फतेह शाह ने कर्पूर घाटी में आक्रमण किया और बैजनाथ घाटी को लूटने के बाद गरसार ग्राम बद्रीनाथ मंदिर को चढ़ा दिया था।
  • ​जगतचंद ने मुगल बादशाह को कीमती पहाड़ी चीजें भेंट की थी थी, जिससे मुगल शासक ने उसे अभयदान दिया था।
  • ​जगतचंद ने जुआरीयों पर कर लगाया था।
  • ​जगतचंद की मृत्यु चेचक के कारण 1720 ई० में हुई।
  • ​जगत चंद के बरम (भुवानी) ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि ज्ञानचंद के समय वीरेश्वर जोशी वैद्यकुड़ी ने बधाणगढ़ की जासूसी की थी।
  • ज्ञानचंद ने वीरेश्वर जोशी को जागीरने रौत के रूप में दी थी।
  • जगतचंद ने 1000 गाय दान की थी जिस कारण इसे गोसहस्रदान कहते हैं।

चंदवंश का अवनति काल (Decline Period of Chand Dynasty)

  • जगतचंद का उत्तराधिकारी देवीचंद था, 1720 ई० से चंद वंश का अवनति काल शुरू हुआ।
  • ​देवीचंद ने 1720 ई० से 1726 ई० तक शासन किया।
  • ​विक्रमादित्य बनने के चक्कर में देवीचंद ने काफी धन बर्बाद किया जिस कारण उसे कुमाऊँ का विक्रमादित्य भी कहते हैं।
  • ​देवीचंद को कुमाऊँ का मुहम्मद तुगलक भी कहा जाता है।
  • ​श्रीनगर जीतने के असफल प्रयास में देवी चंद ने एक पहाड़ी को विजित कर उसका नाम फतेहपुर रखा था।
  • ​देवीचंद ने रोहेला सरदार दौउद खान को अपना सेनापति नियुक्त किया था।
  • ​देवीचंद के समय काकड़ीघाट में बाबा हर्षदेवपुरी रहते थे, जो देवीचंद को देबुवा कहकर पुकारते थे।
  • ​देवीचंद की हत्या उसके विष्ट दरबारियों में माणिक बिष्ट व उसके पुत्र पूरनमल ने की थी।
  • ​देवीचंद के बाद क्रमशः अजीतचंद, कल्याण चंद, दीपचंद, मोहन चंद, प्रद्युम्न चंद, शिवचंद और अंतिम राजा महेन्द्रचंद आदि कुमाऊँ की गद्दी पर बैठे।
  • ​अजीतचंद के समय पूरनमल एवं उसके पिता माणिकचंद गौड़ बिष्ट के अन्यायपूर्ण शासन को कुमाऊँ में गैडागर्दी कहते थे।

चंद्र शासक कल्याण चंद चतुर्थ (Kalyan Chand IV)

  • ​कल्याण चंद का कार्यकाल 1730 ई० से 1747 ई० तक रहा।
  • ​वह अनपढ़ राजा था। राजा बनने से पूर्व कल्याणचंद छोटी में कल्याण सिंह के नाम से मज़दूरी करता था।
  • ​कल्याण चंद चतुर्थ के समय 1743–1745 ई० को कुमाऊँ पर रुहेलों का आक्रमण हुआ।
  • 1743–44 में रुहेलखंड या कटेहर के सरदार अली मुहम्मद खाँ ने कुमाऊँ पर आक्रमण किया।
  • ​रोहेला आक्रमण के समय गढ़वाल शासक प्रदीप शाह ने कल्याण चंद की मदद की थी।
  • ​कल्याणचंद चतुर्थ ने मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला को भेंट देने के लिए जागेश्वर मंदिर से ऋण लिया था।
  • ​कल्याण चंद को काशीपुर में मुगल वजीर कमरुद्दीन ने गौंड ऑफ ऑनर दिया था।
  • ​कल्याण चंद चतुर्थ ने अल्मोड़ा में चौमहला महल बनवाया, वह अपनी राजधानी को राजबुंगा कहता था।
  • ​कल्याणचंद ने लछी गुसाईं मनराल को सयानाचारी सौंपी जो 16 गाँवों का सयाना था।
  • ​कल्याण चंद चतुर्थ के समय बलिराम चौधरी लेखक था।
  • ​कल्याण चंद चतुर्थ के समय अवध के नवाब मंसूर अली खाँ ने कुमाऊँ के तराई पर अधिकार किया और शिवदेव जोशी को बंदी बनाया था।
  • 'कल्याणचन्द्रोदयम्' पुस्तक के लेखक कवि शिव हैं, जो कल्याणचंद का राजकवि था।
  • ​राजा बनने के बाद कल्याणचंद ने गैड़ागाड़ी शासन के नायक पूरनमल एवं मानिक चंद को मारने के आदेश दे दिए थे।
  • ​जीवन के अंतिम समय में कल्याणचंद चतुर्थ की आँखों की रोशनी चली गयी थी।

दीपचंद

  • 1748 ई० में दीपचंद कुमाऊँ का शासक बना जिसके समय पानीपत का तीसरा युद्ध 1761 ई० में हुआ था जिस युद्ध में मुगल बादशाह के कहने पर दीपचंद ने मराठों के विरुद्ध सैन्य टुकड़ी भेजी थी।
  • ​पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों के खिलाफ 4000 कुमाऊँनी सेना सेनापति हरिराम एवं उपसेनापति बीरबल नेगी के आधिपत्य में भेजी गयी थी।
  • ​पानीपत के तीसरे युद्ध में कुमाऊँ सेना पहाड़ी हथियार के साथ बहादुरी से लड़े थे जिसके लिए एटकिंसन लिखते हैं कि पहाड़ी लोगों ने रॉकेट एवं हैंडग्रेनेड में अपना अच्छा कौशल दिखाया था
  • ​पानीपत के युद्ध के समाप्ति के बाद मुगल बादशाह ने कुमाऊँ सेनापति से मिलने की इच्छा प्रकट की थी और लूट के माल में से मकना नामक हाथी, जेवरात एवं अन्य बहुपयोगी चीजें राजा दीपचंद के लिए भेजी थी।
  • ​दीपचंद बड़े ही मिलनसार एवं दयालु प्रकृति के नृपति थे, उनसे कुछ भी माँगने पर ना कहना जानते थे न ही थे जिस कारण उन्होंने बहुत सी जागीरें लोगों को प्रदान की थी।

कुमाऊँ के इतिहास से संबंधित नोट्स

  • राजा दीपचंद और उनके साथ उनके दो लड़कों को सीराकोट के किले में कैद करके रखा गया था जहाँ उनकी मौत हो गई थी।
  • तामाढौंड का युद्ध 1755 ई० में शिवदेव जोशी एवं गढ़ सेनापति नरपत गुलैरिया के बीच हुआ, जिसमें गढ़ सेनापति सरदार नरपत गुलैरिया मारे गए।
  • ​शिवदेव जोशी के मरने के बाद दीपचंद ने हरदेव जोशी को बर्खास्त कर दिया था।
  • ​दीपचंद के भाई मोहनचंद ने दीपचंद को गद्दी हड़प ली थी और हरदेव जोशी को बंदी बनाया लेकिन वह किसी तरह वहाँ से भाग निकला।
  • हरदेव जोशी ने गढ़वाल के शासक ललितशाह को कुमाऊँ पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया।

    • बगवाली पोखर का युद्ध 1779 ई० में ललितशाह की सेना व मोहन चंद्र के बीच हुआ, जिसमें मोहनचंद लखनऊ भाग खड़ा हुआ।
    • ललितशाह ने अपने पुत्र प्रद्युम्नशाह को कुमाऊँ की गद्दी पर बैठाया, और हरदेव जोशी को प्रधानमंत्री नियुक्त किया।
    • प्रद्युम्न शाह 1779 ई० से 1786 ई० तक कुमाऊँ की गद्दी पर बैठा जिसने स्वयं को दीपचंद का दत्तक पुत्र घोषित किया।
    • ​जयकृत शाह की मृत्यु के बाद प्रद्युम्न शाह श्रीनगर आ गया था।
    • 1786 ई० में गढ़वाल एवं कुमाऊँ कुछ समय के लिए प्रद्युम्न शाह के अधीन हो गया था। हरदेव उसके प्रतिनिधि के रूप में कुमाऊँ का शासन करने लगा।
    • मोहनचंद ने सिंहासन खाली होने का फायदा उठाकर कुमाऊँ की गद्दी हथिया ली, मोहनचंद दूसरी बार कुमाऊँ का राजा बना
    • हरदेव जोशी ने सशक्त सेना तैयार कर 1786 ई० में पालीगाँव के युद्ध में मोहनचंद को हराया था।
    • हरदेव जोशी ने 61वाँ चंद शासक शिवचंद को शासक बनाया
    • शिवचंद को मिट्टी का महादेव कहा जाता है।

महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य

  • ​इसके बाद मोहनचंद के भाई लाल सिंह ने रामपुर के नवाब की सहायता से कुमाऊँ की गद्दी हथिया ली थी।
  • लाल सिंह ने मोहन चंद के पुत्र महेन्द्रचंद को गद्दी पर बैठाकर खुद उसका प्रधानमंत्री बना।
  • अंतिम चंद शासक महेन्द्रचंद 62वाँ चंद शासक था यदि मोहनचंद को एक बार गिनें तो 61वाँ चंद शासक था।
  • हर्षदेव जोशी ने गोरखा नायक बहादुरशाह को कुमाऊँ पर आक्रमण का न्योता दिया।
  • ​हवालबाग के साधारण युद्ध में चंदों की हार के बाद 1 फरवरी 1790 ई० को अल्मोड़ा पर गोरखों का कब्ज़ा हो गया था।
  • ​ब्रिटिशकाल में चंद राज्य दो भागों में विभाजित हुआअल्मोड़ा शाखा एवं काशीपुर शाखा में।
  • ​महेन्द्रचंद के पुत्र प्रतापचंद को अंग्रेजों ने कुछ गाँव जागीर के रूप में प्रदान की।
  • ​काशीपुर शाखा में लाल सिंह के पुत्र गुमान सिंह ने राज किया जिसके दरबार में कवि गुमानी पंत रहते थे।
  • ​उत्तराखण्ड सांसद रहे केसी सिंह बाबा काशीपुर चंद शाखा से सम्बन्ध रखते थे।













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